Friday, May 3, 2019

नवीन पटनायक क्या सबसे लंबे वक़्त तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड तोड़ पाएंगे?

ओडिशा की राजनीति में नवीन पटनायक के उनके बीगल कुत्तों 'ब्रूनो' और 'रॉक्सी' के अलावा कोई दोस्त नहीं है. नवीन की ज़िंदगी में नाटकीयता के लिए कोई जगह नहीं है.

अच्छा भाषण देना उनके गुणों में शामिल नहीं है. अच्छा भाषण देना तो दूर वो अपने लोगों की भाषा तक नहीं बोल सकते हैं. उनके सभी भाषण उनके साथी 'रोमन स्क्रिप्ट' में तैयार करते हैं और वो उसे 'रोबोट' की तरह पढ़ भर देते हैं.

कई बार वो शब्दों का ग़लत उच्चारण करते हैं. लेकिन उनके लोग इससे नाराज़ होने के बजाए अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हैं.

नवीन पटनायक की जीवनी लिखने वाले रूबेन बनर्जी बताते हैं, ''जब नवीन साल 2000 में ओडिशा विधानसभा का चुनाव लड़ने आए तो उन्हें उड़िया बोलनी नहीं आती थी, क्योंकि तब तक उन्होंने लगभग अपनी पूरी उम्र ओडिशा के बाहर बिताई थी. मुझे याद है वो अपने भाषण के शुरू में 'रोमन' में लिखी एक लाइन बोलते थे, 'मोते भॉलो उड़िया कॉहबा पाई टिके समय लगिबॉ.''

''लेकिन इसका उन्हें फ़ायदा हुआ. उस समय ओडिशा में राजनीतिक वर्ग इतना बदनाम हो चुका था कि लोगों को नवीन का उड़िया न बोल पाना अच्छा लग गया. लोगों ने सोचा कि इसमें और दूसरे राजनेताओं में फ़र्क है. ये ही हमें बचाएंगे. इसलिए उन्होंने नवीन को मौका देने का फ़ैसला किया.''

''नवीन अभी भी ढ़ंग से उड़िया नहीं बोल सकते, लेकिन उस समय उन्होंने लोगों से बिना उनकी ज़ुबान बोले जो संवाद स्थापित किया, वो अब भी बरकरार है. क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि ममता बनर्जी बांग्ला में बात किए बिना बंगाल के लोगों से वोट मांग सकती हैं? अब तो हालत ये है कि नवीन लोगों से उनकी भाषा में बात करें या अंग्रेज़ी में बात करें या फ़्रेंच भी बोलें तो भी कोई फ़र्क नहीं पड़ता.''

नवीन पटनायक के ओडिशा में कई अंतर्विरोध हैं. इस राज्य में भारत के सबसे ग़रीब लोग रहते हैं. फिर भी आपको भुवनेश्वर, कटक और पुरी की सड़कों पर कुछ ही भिखारी दिखाई देंगे.

ओडिशा का साक्षरता प्रतिशत शायद भारत में सबसे कम है, लेकिन तब भी प्रतियोगात्मक परीक्षाओं में ओडिशा से निकलने वालों की तादाद भारत के अन्य इलाकों से ज़्यादा है.

सार्वजनिक स्वास्थ्य के मामले में भी ओडिशा की गिनती भारत के चोटी के राज्यों में नहीं होती फिर भी यहाँ के शहर अपेक्षाकृत साफ़ दिखाई देते हैं, जहाँ सड़कों पर नियम से झाड़ू दी जाती है और जहाँ भारत के अन्य हिस्सों की तरह नालियाँ बंद नहीं होतीं.

नवीन के बारे में मशहूर है कि वो शायद भारत के सबसे चुप रहने वाले राजनेता हैं जिन्हें शायद ही किसी ने ऊँची ज़ुबान में बात करते सुना है.

हाल ही में नवीन पटनायक की जीवनी लिखने वाले अंग्रेज़ी पत्रिका आउटलुक के संपादक रूबेन बनर्जी बताते हैं, ''आप उनसे मिलेंगे तो पाएंगे कि उन से बड़ा मृदु- भाषी, शिष्ट, संभ्रांत और कम बोलने वाला शख़्स हैं ही नहीं.. कभी कभी तो लगता है कि वो राजनेता हैं ही नहीं. लेकिन सच ये है कि भारत में उनसे बड़े राजनीतिज्ञ कम लोग हैं.''

''वो न सिर्फ़ राजनीतिज्ञ हैं बल्कि निर्मम राजनीतिज्ञ हैं. इस हद तक कि पहुंचे हुए राजनीतिज्ञ भी उनका मुक़ाबला नहीं कर सकते. कुछ लोग कहते हैं कि राजनीति उनकी रगों में है. लेकिन ये भी सच है कि अपने जीवन के शुरुआती 50 सालों में उन्होंने राजनीति की तरफ़ रुख़ नहीं किया. लेकिन एक बात पर सभी एकमत हैं कि नवीन बहुत चालाक हैं. ओडिशा में उनकी टक्कर का राजनेता दिखाई नहीं देता.''

नवीन पटनायक को राजनीति विरासत में मिली थी. उनके पिता बीजू पटनायक न सिर्फ़ ओडिशा के मुख्यमंत्री थे बल्कि जाने माने स्वतंत्रता सेनानी और पायलट थे. दूसरे विश्व युद्ध, इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम और 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तान के हमले के दौरान उनकी भूमिका को अभी तक याद किया जाता है.

बीजू पटनायक के जीवनीकार सुंदर गणेशन अपनी किताब 'द टॉल मैन' में लिखते हैं, ''बीजू पटनायक ने दिल्ली की सफ़दरजंग हवाई पट्टी से श्रीनगर के लिए अपने डकोटा डी सी-3 विमान से कई उड़ानें भरी थीं. 17 अक्तूबर 1947 को वो लेफ़्टिनेंट कर्नल देवान रंजीत राय के नेतृत्व में 1- सिख रेजिमेंट के 17 जवानों को ले कर श्रीनगर पहुंचे थे.''

''उन्होंने ये देखने के लिए कि हवाई पट्टी पर पाकिस्तानी सैनिकों का कब्ज़ा तो नहीं हो गया था, दो बार बहुत नीची उड़ान भरी थी. प्रधानमंत्री नेहरू की तरफ़ से उन्हें साफ़ निर्देश थे कि अगर उन्हें ये लगे कि हवाई पट्टी पर पाकिस्तान का नियंत्रण हो गया है तो वो वहाँ पर अपना विमान न उतारें.''

''बीजू पटनायक ने विमान को ज़मीन से कुछ ही मीटर ऊपर उड़ाते हुए देखा कि विमान पट्टी पर एक भी शख़्स मौजूद नहीं था. उन्होंने अपने विमान को नीचे उतारा और वहाँ पहुंचे 17 भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी हमलावरों को खदेड़ने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.''

एक बार उन्होंने बाकू, अज़ेरबैजान से उड़ान भर कर स्टेलिनग्राड में जर्मन सैनिकों से घिरे रूसी सैनिकों को हथियार पहुंचाए थे. उसी तरह 1942 में बर्मा में जापान के कब्ज़े के दौरान भारी बमबारी के बीच ब्रिटिश लोगों को वहाँ से बचा कर लाए थे. जब बीजू पटनायक का देहांत हुआ तो उनके ताबूत पर तीन देशों के झंडे लिपटे हुए थे - भारत, रूस और इंडोनेशिया.

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